Internal Working of ARPANET Protocol

Internal Working of ARPANET Protocol – ARPANET Protocol के अन्तर्गत दो Nodes को आपस में Communicate करने के लिए ठीक उसी तरह के Protocol को Use करना होता था, जिस तरह का Protocol किसी Standard Postal Mail यानी चिट्ठी को भेजने के लिए किया जाता है। चलिए! ARPANET Protocol की Working को एक उदाहरण द्वारा समझने की कोशिश करते हैं।

हम मान लेते हैं कि कोई दुकानदार अपनी दुकान पर कुल 10 Product Sale करता है और प्रत्येक Product की अपनी एक Detail है, जिसे दुकानदार ने एक Catalog के रूप में Publish करवाया है। इस Catalog को वह दुकानदार Standard Postal Mail यानी डाकखाने द्वारा अपने किसी Customer को भेजता है ताकि वह Customer उस Catalog में Specified किसी Product को देखकर उनमें से एक या अधिक Products को खरीदने हेतु उत्सुक हो सके।

लेकिन किसी कारणवश वह दुकानदार अपने Customer को पूरा Catalog एक Single Mail के रूप में Post नहीं कर सकता। इसलिए वह अपने Catalog के प्रत्येक Product Page को फाडकर अलग-अलग 10 लिफाफों में डालता है और प्रत्येक लिफाफे पर उस Customer के Address को लिख कर अलग-अलग दिन Post कर देता है।

परिणामस्वरूप अलग-अलग दिन Post करने की वजह से Catalog का प्रत्येक Product Page Different माध्‍यमों व Different Routes से होता हुआ उस Customer के Address पर पहुंचता है। क्‍योंकि अलग-अलग दिन व माध्‍यमों से आने वाले सभी 10 लिफाफे डाकिया एक-एक करके उस Customer तक पहुंचा देता है, लेकिन सभी Product Pages के लिफाफे Customer को उसी क्रम में Deliver हों, जिस क्रम में वे Catalog में थे, ऐसा जरूरी नहीं होता। इसलिए एक ही Catalog के विभिन्न Products Page अलग-अलग दिन Customer को प्राप्त हो सकते हैं।

अत: जब सभी 10 लिफाफे उस Customer के Address पर Deliver हो जाते हैं, उसके बाद वह Customer उन सभी 10 लिफाफों को Open करता है और प्रत्येक Product Page को फिर से एक क्रम में व्‍यवस्थित करके Catalog को Re-Create कर लेता है और क्‍योंकि प्रत्येक Product Page पर उसका Page Number लिखा हुआ होता है, इसलिए Customer जिस Catalog को Recreate करता है, वह Exactly वही Catalog होता है, जिसे दुकानदार भेजना चाहता था।

एक Source Node से Message को किसी दूसरे Destination Node तक Send करने के लिए ARPANET Protocol में भी ठीक यही तरीका Use किया गया था, जिसके अन्तर्गत जिस Information को Source Computer से Destination Computer पर भेजना होता था, उसे कई छोटे-छोटे टुकडों में विभाजित कर दिया जाता था और Message के इन छोटे-छोटे टुकडों को Packets के नाम से जाना जाता था।

इन Packets की विशेषता ये होती थी कि प्रत्येक Packet के दो हिस्से होते थे, जिन्हें HeaderData नाम से Represent किया जाता था। Packet के Header Section में Destination Computer का Address होता तथा प्रत्येक Packet का स्वयं का एक Serial Number या Order Number होता था।

परिणामस्वरूप Source Computer से Packets के रूप में टुकडों में भेजा गया सारा Message चाहे जिस Route से जाए लेकिन पहुंचता एक ही Destination पर था क्‍योंकि सभी Packets के Header में समान Destination Computer का Address Specified होता था। ठीक उसी तरह से जिस तरह से दसों लिफाफों को अलग-अलग दिन अलग-अलग समय पर Post किए जाने के बावजूद वे सभी समान Customer तक ही पहुंचते हैं, क्‍योंकि सभी लिफाफों पर समान Customer का Address लिखा होता है।

जब सभी Packets अपने Destination Computer पर पहुंच जाते थे, तो फिर Destination Computer द्वारा प्रत्येक Packet को उसके Serial Number के अनुसार फिर से एक क्रम में Rearrange कर लिया जाता था। परिणामस्वरूप Destination Computer पर फिर से Exactly वही Information Recreate हो जाता था, जिसे Source Computer से भेजा गया होता था।

यदि किसी कारणवश कोई Packet किसी एक Route से अपने Destination पर नहीं पहुंच पाता था, तो वह स्वयं ही दूसरे Route का चुनाव कर लेता था। जबकि यदि किसी कारणवश उस Information का कोई भी Packet अपने Destination पर नहीं पहुंचता था, तो पूरा Message Fail हो जाता था क्‍योंकि Destination Computer पर Packets की Reassembling के दौरान यदि सभी Packets उपलब्ध नहीं होते थे, तो Destination Computer उन्हें Assemble ही नहीं करता था, बल्कि Source Computer को एक Error Message Send कर देता था।

परिणामस्वरूप Source Computer उस Information को फिर से Resend कर देता था और ये प्रक्रिया तब तक चलती रहती थी, जब तक कि Source Computer से भेजा गया Message Destination Computer पर Successful तरीके से Deliver न हो जाए और Destination Computer से Successful Delivery का Acknowledgement Notification फिर से Source Computer को Send न कर दिया जाए।

चूंकि Destination Computer पर विभिन्न Packets को किस तरह से और किस क्रम में Reassemble होना है, इस बात की पूरी Information स्वयं प्रत्येक Packet के Header में ही होती थी, इसलिए यदि किसी कारण से कोई एक भी Packet अपने Destination पर नहीं पहुंचता था, तो पूरा Operation Fail हो जाता था।

इस तरीके को Use करने की वजह से Data Transmission की Security भी निश्चित हो जाती थी, क्‍योंकि यदि कोई शत्रुदेश इन Transmit होने वाले Packets को Capture भी कर ले, तो भी वह उन्हें Decode नहीं कर सकता था, क्‍योंकि इन्हें Decode करने का Code भी स्वयं Packet के Header में ही होता था और जब तक Transmit होने वाली Information के सभी Packets को Capture न किया जाए तब तक सारी Information को Reassemble नहीं किया जा सकता और सारे Packets कभी भी एक ही Route से Travel करते हुए Destination तक नहीं पहुंचते थे, इसलिए कभी भी सभी Packets को Capture करना सम्भव नहीं हो सकता था।

इसलिए ARPANET Protocol को Packet Switching Technology के नाम से भी जाना जाता है क्‍योंकि किसी Information का कौनसा Packet किस Route से होता हुआ Destination पर पहुंचेगा, इस बात का पता कोई भी नहीं लगा सकता। जबकि सभी Packets अपनी सुविधानुसार Different Routes पर Switch होते हुए समान Destination पर पहुंचते हैं।

हालांकि ARPA Organization के अन्तर्गत ARPANET Protocols का प्रयोग करते हुए दो Nodes को आपस में Wire के माध्‍यम से Interconnect किया गया था, क्‍योंकि दोनों Nodes समान Organization में आस-पास ही थे, जिन्हें आसानी से Wire Cable का प्रयोग करते हुए Connect किया जा सकता था।

लेकिन दो अलग Locations यानी दो अलग देशों के बीच Interconnection करने के लिए भी एक Wired माध्‍यम की जरूरत थी। ऐसे में विभिन्न मित्रदेशों के बीच Wire यानी Cable बिछाना अपने आप में काफी मुश्किल, Time Consuming व खर्चीला काम था और अमेरिका इसके पक्ष में नहीं था।

इसलिए ARPANET के वैज्ञानिक कोई पहले से उपलब्ध तरीका उपयोग में लेते हुए Networking System Establish करना चाहते थे। ऐसे में फिर एक बार उन्हें उसी Telephone Lines का इस्तेमाल करते हुए Networking System Establish करने का विचार आया जिसे मूल रूप से Morse Codes Signals को Transmit करने के लिए और फिर Telephone Lines के लिए पहले से ही दुनियां भर में बिछाया जा चुका था।

लेकिन Telephone Lines की अपनी एक अलग समस्या थी, जहां Telephone Lines पर वास्तव में Sound Waves को Travel करना होता था जो कि Analog Signals होते हैं, जबकि पूरा Network System एक प्रकार से Computerized System था जो कि Digital System होता है।

यानी Telephone के Analog Signals व Computer System के Digital Signals में एक मुख्‍य अन्तर ये होता है कि Analog Signals केवल दो तारों पर Travel कर सकते हैं, इसलिए Telephone Lines बिछाते समय केवल 2 तारों के समूह को ही बिछाया गया था, जबकि Digital Signals को Travel करने के लिए कम से कम 8 तारों के समानान्तर समूह (Parallel Set) की जरूरत होती है।

इसलिए सामान्‍य तरीके से तो दो अलग Locations पर रखे Computer Systems को आपस में Network के रूप में Setup नहीं किया जा सकता था। लेकिन इस समस्या के समाधान के लिए Modem नाम की Device का विकास किया गया जो कि Modulator-Demodulator का Abbreviation है।

इस Modem की विशेषता ये थी कि ये Source Computer से Digital Signals को Analog Signals में Convert करके Telephone Lines के माध्‍यम से Destination Computer पर Submit कर देता था, और फिर Destination Computer पर इसकी बिल्कुल विपरीत प्रक्रिया करते हुए आने वाले Analog Signals को फिर से Digital Signals में Convert कर देता था, जिससे Destination Computer Data को Exactly उसी Format में प्राप्त करने में सक्षम हो जाता था, जिस Format में उसे Source Computer से Send किया गया होता था।

परिणामस्वरूप Modem के विकास के कारण Telephone Lines के माध्‍यम से दुनियां के किसी भी कोने में रखे Computer System के साथ Connect किया जाना सम्भव हो गया और जैसे ही Modem नाम की ये तकनीक विकसित हुई, U.S. व U.K. के बीच के Networks को Interconnect किया जाना सम्भव हो गया।

एक Computer System से दूसरे Computer System के बीच Data किस प्रकार से सुरिक्षत व सही तरीके से Transmit हो पाएगा, इस हेतु Packet Switching नाम की तकनीक को Vinton CerfRobert Kahn नाम के ARPA के दो वैज्ञानिकों ने विकसित किया था, जिसे ARPANET Protocol के नाम से जाना गया था।

आगे चलकर इसी Protocol को जरूरत के अनुसार और विकसित करके व इसमें और नए Features को Add करके TCP/IP Protocols के नाम से Standardized किया गया तथा इसी TCP/IP Protocols Suite के Standard को ही 1974 में Internet नाम दिया गया जो कि वास्तव में TCP/IP Network Protocols के समूह का नाम है।

यानी ARPANET Protocol ही बाद में TCP/IP Protocols का समूह बना, जिसे तकनीकी रूप से Internet के नाम से जाना गया और 1983 में ARPANET पूरी तरह से TCP/IP Suite के रूप में स्थापित हो गया।

फिर समय के साथ विभिन्न प्रकार की जरूरतों को पूरा करने के लिए इस TCP/IP Network Protocols Suite में और नए Protocols को Add किया जाता रहा और आज भी अलग-अलग तरह की जरूरत को पूरा करने के लिए नए Protocols बनाए जाते हैं और उन्हें TCP/IP Network Protocols के Set में Add कर दिए जाते हैं जबकि सुविधा के अनुसार Outdated Protocols को समय-समय पर नए Protocols से Replace भी किया जाता है।

इस प्रकार से ARPA Network पूरी तरह से Packet Switching Technology पर आधारित था जो कि आगे चलकर TCP/IP (Transmission Control Protocol / Internet Protocol) नाम के Networking Protocol Suite के Development में सहायक हुआ।

जब हम Networking के सन्दर्भ में बात करते हैं, तब Networking Protocols उन Set of Rules को Represent करते हैं, जिन्हें किसी Message को Network के माध्‍यम से एक Device से दूसरी Device के बीच Exchange करने के लिए Follow किया जाना होता है, जबकि Device के रूप में हम Mobile Phone, Computer, Tablet PC, आदि किसी को भी Use कर सकते हैं।

Network Protocols उन Rules को Represent करते हैं, जो Network पर Travel होने वाले किसी Data के Format (Text, Image, Audio, Video, etc…) को Specify करते हैं, Traveling के दौरान Trigger होने वाली Errors की Checking करते हैं, यदि Message अपने Source से Destination पर Normally Transmit हो जाए तो Source को फिर से Successful Transmission का Acknowledgement Return करते हैं। आदि… आदि…

यानी किसी Message के Source से Destination तक Successfully Travel होने के लिए जिन भी नियमों को Follow करने की जरूरत होती है, उन सभी नियमों के समूह को Network Protocols के नाम से जाना जाता है, जबकि Different Type के Data (Text, Image, Sound, Video, etc…) को Transmit होने के लिए Different प्रकार के Protocols को Follow करने की जरूरत पडती है। इसलिए विभिन्न प्रकार के Data के Transmission हेतु जितने भी प्रकार के Network Protocols को परिभाषित किया गया है, उन सभी के समूह को TCP/IP Protocols Suite के नाम से जाना जाता है और इसी पर हमारा सारा Modern Internet Infrastructure आधारित है।

अत: यदि हम ये कहें कि ARPA द्वारा Networking के लिए Develop किया गया ARPANET ही वर्तमान समय का Internet है, तो गलत नहीं होगा। अन्तर केवल इतना है कि ARPANET को केवल मित्रदेशों के बीच Successful तरीके से Distributed Information Sharing हेतु Develop व Use किया गया था, जबकि Internet को बिना किसी Restriction के सारी दुनियां द्वारा Use किया जा रहा है।

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