7 Easy Steps to create a Computer Program

Steps to Create a Computer Program: किसी भी Computer Program को Create करने में सामान्‍यत: अग्रानुसार Describe किए गए कुल 7 Steps को Follow किया जाता है और जहां तक सम्‍भव हो, एक Programmer के रूप में हमें इन सातों Steps को जरूरत Follow करना चाहिए। क्‍योंकि यदि हम इन सातों Steps को Follow करते हैं, तो हमारे Program में Syntactical या Logical किसी भी  प्रकार के Errors होने की सम्‍भावना काफी कम होती है। साथ ही हमारा Program कम समय में व ज्‍यादा बेहतर Quality Codes पर आधारित होते हैं, जिन्‍हें भविष्‍य के लिए Manage, Maintain, Extend Upgrade करना तुलनात्‍मक रूप से ज्‍यादा आसान होता है।

सामान्‍यत: नए Programmers इन Steps को “As It Is” Follow नहीं करते, जिसकी वजह से उन्‍हें उनका Program Develop करने में काफी परेशानियों का सामना करना पडता है। क्‍योंकि एक नया Programmer यदि आसानी से Program Develop न कर सके अथवा यदि वह अपने बनाए Program की गलतियों को स्‍वयं अपने स्‍तर पर ठीक न कर सके, तो Program Develop करने का उसका Confidence यानी आत्‍म-विश्‍वास काफी प्रभावित होता है। परिणामस्‍वरूप उसे ऐसा लगने लगता है कि वह कभी भी अच्‍छा प्रोग्रामर नहीं बन सकता। जबकि सच्‍चाई ये है कि यदि वह इन 7 Steps को Follow करता है, तो उसे कोई भी प्रोग्राम बनाने में कोई दिक्‍कत नहीं आती।

हालांकि ये सातों Steps अपने आप में काफी जटिल, बडे व Time Consuming हैं, जिन्‍हें पूरी तरह से Discuss करने के लिए हमें पूरी एक पुस्‍तक लिखने की जरूरत पड सकती है, लेकिन फिर भी इस Article में हम इन Steps को सारांश के रूप में समझ सकते हैं।

Problem Definition

किसी भी प्रोग्राम को बनाने का ये सबसे पहला Step होता है। क्‍योंकि इस चरण में हमें उस समस्या को पूरी तरह से समझना होता है, जिसका प्रोग्राम बना कर कम्प्यूटर से समाधान प्राप्त करना हैं। यानी प्रोग्राम के द्वारा हमें क्या प्राप्त परिणाम करना है, यह निश्‍कर्ष निकालना होता है।  ये Step किसी भी Computer Program का सबसे महत्‍वपूर्ण Step होता है, क्‍योंकि पूरे Program का भविष्‍य इसी बात पर निर्भर होता है कि हमने हमारी समस्‍या को कितना बेहतर तरीके से समझा।

यदि हम हमारी समस्‍या को उपयुक्‍त तरीके से न समझें, तो जरूरी नहीं है कि हमारा प्रोग्राम हमें वही Processed Result Provide करेगा, जो उसे करना चाहिए। Program का यही Step इस बात को निश्चित कर देता है कि हमें हमारे प्रोग्राम द्वारा क्‍या Output प्राप्‍त करना है।

Problem Design

इस चरण में समस्या को कई भागों में बांट कर उसे बीजगणितीय एल्गोरिद्‌म के अनुसार लिख लिया जाता है। एल्गोरिद्‌म लिखने के लिये फ्‌लोचार्ट आदि को भी उपयोग में लिया जाता है। यानी पहले Step में हम हमारी समस्‍या से सम्‍बंधित जिन जरूरतों को अपने Program द्वारा Fulfill करना चाहते हैं, उन जरूरतों को किस प्रकार से पूरा किया जाएगा, इस बात का निर्णय इस Step में लिया जाता है, क्‍योंकि यही Step तय करता है कि हमारा प्रोग्राम कैसा Final Output Generate करेगा।

Problem DefinitionProblem Design इन दोनों Steps को अच्‍छी तरह से Follow करने के लिए ही Computer Science व Information Technology के विभिन्‍न Degree Level Courses में “System Analysis and Design” नाम का एक Subject पढाया जाता है, जो कि पूरी तरह से इन्‍हीं दोनों Steps को Detail से Discuss करता है।

Program Coding

इस चरण में हाई लेवल भाषा के कोडों के अनुसार एल्गोरिद्‌म व फ्‌लोचार्ट की मदद से प्रोग्राम की कोडिंग की जाती है। यानी किसी Program के Codes लिखना किसी भी Application को Develop करने का तीसरा Step होता है, न कि पहला। जबकि सामान्‍यत: नए Programmers सीधे इसी Step को Follow करते हैं। यानी पहले दो Steps को Follow नहीं करते जिसके कारण उन्‍हें कभी भी ये बात समझ में नहीं आती कि आखिर वे गलती कहां करते हैं, जिसकी वजह से उन्‍हें अपना प्रोग्राम बार-बार Change करना पडता है।

Program Execution

इस चरण में बनाये गए प्रोग्राम को चलाया जाता है। सामान्‍यत: इस  Step का मूल उददे्श्‍य इसी बात का पता लगाना होता है कि पहले दो Steps द्वारा जिन Requirements को Identify किया गया है, तीसरे Step में लिखे गए Program Codes द्वारा वही Output Generate हो रहा है या नहीं। इसी Step में Programmer को उसके Program में की गई Syntactical Errors या Logical Errors का पता चलता है, जिसे सामान्‍यत: Compile TimeRuntime Errors के नाम से जाना जाता है।

Program Debugging

जब प्रोग्राम को बनाया जाता है, तब कई तरह की गलतियां रह जाती हैं। जिससे जब पिछला Step Follow करते हुए प्रोग्राम को चलाया जाता है तब या तो प्रोग्राम रन नहीं होता या फिर सही परिणाम प्राप्त नहीं देता। इस प्रकार की गलतियों को Programming  की भाषा में Bug कहा जाता है।

चूंकि हर High Level Programming Language के Compiler में एक Debugger Software भी होता है, जो प्रोग्राम में जिस जगह पर गलती होती है, वहीं पर आकर रूक जाता है। परिणामस्‍वरूप जब Program को Run करने पर उसमें कोई Error होती है, तो उस Error को सही करने का काम इस Step में किया जाता है। प्रोग्राम मे होने वाली गलतियों यानी Error या Bugs को ढूंढना व उन्हे सही करने की प्रक्रिया को ही Debugging कहा जाता हैं।

Program Coding, Program Execution व Program Debugging ये तीनों Steps मूल रूप से विभिन्‍न प्रकार की Programming Languages जैसे कि C, C++, Java, C#, Oracle, VB, HTML, CSS, JavaScript, jQuery, PHP आदि के अन्‍तर्गत आते हैं। इसलिए हम जिस Programming Language को अपना Program बनाने के लिए Use करते हैं, हमें उसी Programming Language के Codes, Compiler व Debugger तथा IDE का प्रयोग करना होता है। जबकि हर Programming Language अपने आप में एक काफी बडा Subject होता है।

Program Testing

कई बार प्रोग्राम पूरी तरह सही रन होता है, लेकिन फिर भी उसमें गलती होती है, जो किसी विशेष परिस्थिति में ही अपना असर दिखाती है। इस तरह की गलती को, तार्किक गलती या Logical Errors कहते हैं। इस प्रकार की गलती होने पर हमारा Program सामान्‍य रूप से तो ठीक परिणाम देता है, लेकिन किसी विशेष परिस्थिति होने पर हमें वांछित सही परिणाम प्राप्त नहीं होता है। सामान्‍यत: इस प्रकार की गलतियों का पता तब तक नहीं चलता, जब तक कि वह विशेष परिस्थिति न बने, जिसमें इस प्रकार की Errors Trigger हों। इसलिए इस प्रकार की गलतियों का पता लगाने व सुधारने के लिये प्रोग्राम से ऐसी समस्याओं का हल मांगा जाता है, जिसका परिणाम हमें पहले से ही पता होता है।

इस प्रक्रिया को Program Testing करना कहते हैं और हर अच्‍छी Software Development Company में Software की Testing करने के लिए एक अलग से Testing Department भी होता है, जहां उस कम्‍पनी में Develop किए गए Software की केवल Testing का ही काम किया जाता है।

Program Documentation

कई बार प्रोग्राम इतने बडे व जटिल हो जाते हैं कि कब कहां और क्या होना है और कौनसा प्रोग्राम क्यों लिखा गया था, इसका पता ही नहीं चल पाता है। इस तरह की समस्याओं से बचने के लिये प्रोग्राम में कई जगहों पर ऐसी टिप्पणियां डाल दी जाती हैं, जिससे पता चल सके कि प्रोग्राम क्या है व वह प्रोग्राम किसलिये लिखा गया है।

यानी Program Documentation का काम सामान्‍यत: Program Code लिखने वाला Coder स्‍वयं अपनी सुविधा के लिए करते हुए Program के Source Codes के बीच जगह-जगह पर Comments लिखते हुए इस बात को निर्देशित कर देता है कि किसी अमुक Code को उसने क्‍यों‍ लिखा है अथवा किसी अमुक Code या Statement को लिखने का क्‍या कारण है। ताकि यदि कभी  भविष्‍य में उसी प्रोग्राम को फिर से Modify करने की जरूरत पडे, अथवा उसी प्रोग्राम को किसी दूसरे प्रोग्रामर द्वारा Modify करने की जरूरत पडे, तो उस प्रोग्राम को आसानी से Modify  किया जा सके।

इतना ही नहीं, यदि Program काफी बडा होता है, तो उस Program को किस प्रकार से उपयोग में लेना है, इस बात की पूरी जानकारी उस Program को Use करने वाले User को देने के लिए उस Program का एक Documentation या Manual भी Create किया जाता है, जिसे पढकर User उस Program को ज्‍यादा आसानी से समझकर उपयोग में लेने की सुविधा प्राप्‍त करता है।

तो, क्‍या आप अपना प्रोग्राम बनाते समय इन सातों Steps को ठीक से Use करते हैं? यदि नहीं करते, तो निश्चित रूप से आपको अपना Program बनाने में काफी दिक्‍कत आती होगी। इन सातों Steps को Follow कीजिए, आप काफी कम समय में ज्‍यादा बेहतर प्रोग्राम बनाने की कला सीख लेंगे। इतना ही नहीं इसी तरह के कई और Rules को Follow करने के विषय में आप हमारी पुस्‍तक C Programming Language in Hindi पढ सकते हैं, क्‍योंकि इस पुस्‍तक में केवल Programming Concepts को ही Discuss नहीं किया गया है, बल्कि एक नया Programmer किन-किन परेशानियों को Face करता है और उन्‍हें किस तरह से Resolve किया जा सकता है, इस विषय में भी काफी Discuss किया गया है। (Steps to Create a Computer Program)

Assembler Compiler and Interpreter. All these are just different.
Problem = Doing Something

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